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रत्न

अनिष्ट ग्रहों का प्रभाव को दान, पूजा और विभिन्न रत्नों को धारण कर कम अथवा नष्ट किया जा सकता है

सूर्य रत्न - माणिक्य

माणिक्य को अंग्रेजी में रूबी व संस्कृत में माणिक्य कहते हैं। इसके अधिष्ठाता श्री सूर्यनारायण हैं।

यदि किसी जातक की कुण्डली में सूर्य अशुभ हो तो उसको सूर्य के बीज मंत्र का कम से कम 31,000 की संख्या में जप करना चाहिए। जप प्रारंभ शुक्ल पक्ष में शुभ मुहूर्त में सूर्योदय से प्रारंभ करना चाहिए । जाप करते समय अपने पास ताम्र के पात्र में शुद्ध जल, चावल, लाल चंदन, लाल कनेर का पुष्प गंगाजल व गुड़ डालकर पात्र को लाल वस्त्र व आम के पत्तों से ढक लेना चाहिए साथ ही सूर्य के निमित्त दान वस्तुओं को पास में रख लेना चाहिए।

सूर्य का बीज मंत्र - ॐ हृां हृौं सः सूर्याय नमः

सूर्य के निमित्त दान वस्तुएं

गेहूँ, लालचंदन, गुड़, लालपुष्प, लालवस्त्र, रक्तवर्ण की गाय, सोना, माणिक्य, ताम्रपात्र, नारियल, मिष्ठान।

द्वादश भावों में सूर्य का प्रभाव

यदि प्रथम भाव में सूर्य हो तो जातक साहसी, उदार स्वतंत्र विचारों वाला चौड़े कान व उच्च मस्तक वाला होता है । द्वितीय भाव में सूर्य हो तो मुख रोगी, सम्पत्तिवान, भाग्यवान, झगड़ागू, नेत्र-दंत-कर्ण रोगी होता है । तृतीय भाव में सूर्य हो तो पराक्रमी, प्रतापशाली, कवि, बंधुहीन, लब्ध प्रतिष्ठित, बलवान होता है । चतुर्थभाव में सूर्य हो तो सुन्दर, चिन्ताग्रस्त, कठोर, अपव्ययी, पितृधन नाशक, तेजस्वी, वीर्यवान, मातुल कष्टदायक, श्रीमान, निरोगी होता है । सातवें भाव में सूर्य हो तो स्त्री क्लेष कारक, स्वाभिमानी, कठोर, राज्य से अपमानित, चिंता युक्त होता है । आठवें भाव में सूर्य हो तो पित्तरोगी, चिंतायुक्त, क्रोधी, धनी, सुखी, धैर्यहीन, निर्बुद्धि होता है । नवें भाव में सूर्य हो तो योगी, तपस्वी, सदाचारी नेता, ज्योतिषी, साहसी, भ्रातृ सुख व वाहन सुख से युक्त होता है । दसवें भाव में सूर्य हो तो प्रतापी, व्यवसाय में कुशल, लब्ध प्रतिष्ठित, ऐश्वर्य सम्पन्न होता है । ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो धनी, बलवान, मितभाषी, सुखी, उदर रोगी, अल्प संतान होती है । बारहवें भाव में सूर्य हो तो जातक धनी बलवान, मस्तक रोगी, आलसी, परदेश वासी, मित्र द्वेषी व कमजोर शरीर से युक्त और सम्पन्न होता है।

सूर्यशांति हेतु उपाय

यदि सूर्य अशुभ स्थिति में हो तो -

  • तांबे की अंगुली में माणिक्य या विधिवत तैयार सूर्य यंत्र गले में धारण करें।
  • खाना खाते समय सोने या तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • 108 रविवारों को तांबे के पात्र में लाल चंदन से युक्त जल का अध्र्य देना चाहिए।
  • आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ 108 बार करना चाहिए।
  • 40 दिन तक बहते पानी में सूर्य मंत्र बोलते हुए गुड़ या तांबे के सिक्के बहाने चाहिए।

माणिक्य परीक्षण विधि

  1. माणिक्य को कांच के पात्र में रखने पर इसके चारों ओर हल्की किरण दिखाई देती है।
  2. गाय के दूध में माणिक्य रखने पर दूध का रंग गुलाबी दिखाई देता है, शुद्ध माणिक्य चिकना, कान्तियुक्त, पानीदार, भारी व कनेर के पुष्प जैसा लालरंग का होता है।

माणिक्य धारण विधि

माणिक्य रत्न को रविपुष्य योग व रविवार को सूर्य की होरा में या उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र में स्वर्ण या तांबे की अंगुठी में मढ़वाकर अनामिका अंगुली में धारण करना चाहिए, धारण करने के पश्चात गायत्री मंत्र की 3 माला, सूर्य मंत्र की 3 माला व सूर्य के निमित्त दान करना चाहिए।

माणिक्य धारण करने से लाभ

विधि पूर्वक माणिक्य धारण करने से राजकीय क्षेत्रों में प्रतिष्ठा व भाग्य व उन्नति, संतान लाभ, तेजबल हृदय व नेत्ररोग में लाभ, रक्त विकार व शरीर दौर्बल्यादि से मुक्ति मिलती है।

विशेष- मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक एवं धनु राषि वालों को व इन्हीं लग्न में उत्पन्न व्यक्तियों को माणिक्य धारण करना शुभप्रद व लाभदायक रहता है, जिनकी कुण्डली में या चंद्र कुण्डली में सूर्य प्रभावी ना हो रहा हो तो उन्हें भी माणिक्य धारण करना शुभप्रद रहता है।

चन्द्र रत्न - मोती

चंद्ररत्न मोती को मुक्तक, मुक्ता, चंद्रमणि, अंग्रेजी में पर्ल कहा जाता है इसका स्वामी चंद्र है।

जब जन्म या वर्ष कुंडली में चंद्रमा अशुभ हो तो चंद्रदेव के बीज मंत्र का 51 हजार संख्या में जप करना और तत्पष्चात् दशमांश संख्या में हवन कल्याणकारी होता है जप का प्रारंभ पूर्णिमा या शुक्लपक्ष के सोमवार को शुभ मुहूर्त में प्रारंभ करना चाहिए।

चंद्रमा का बीज मंत्र - ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः

चन्द्रमा के निमित्त दान वस्तुएं

चंद्रमा के निमित्त सफेद चंदन, शंख, कपूर, घी, दही, चीनी, मिश्री, खीर, श्वेत-वस्त्र, मोती, श्वेत-पुष्प, चांदी, मिठाई और दक्षिणा।

द्वादश भावों में चंद्रमा का फल

चंद्रमा लग्न में प्रथम भाव में हो तो जातक बलवान ऐश्वर्यशाली, सुखी, व्यवसायी, स्थूलशरीर वाला होता है। द्वितीय भाव में हो तो मधुरभाषी, सुंदर, भोगी, परदेशवासी, शांतिप्रिय, भाग्यवानहोता है। तृतीयभाव में हो तो प्रसन्नचित्त , तपस्वी, आस्तिक, मधुरभाषी, कफरोगी व प्रेमी होता है , चतुर्थभाव में हो तो दानी, मानी, सुखी, रागद्वेष रहित होता है तथा उनका भाग्योदय विवाह के पश्चात होता है। जल जीवी और विद्वान होता है। पांचवे भाव में हो तो चंचल, कन्या संततिवान, सदाचारी, क्षमाषील, युक्ति से धन कमाने वाला होता है। दसवेंभाव में हो तो अल्पायु, कफरोगी, अल्पव्ययी, भ्रातृप्रिय व नेत्ररोगी होता है। सातवें भाव में हो तो सभ्य, धैर्यवान, नेता, प्रवासी, विचारक, जलयात्रा करने वाला अभिमानी वकील व ठंडे स्वाभव वाला होता है। आठवें भाव में हो तो विकारग्रस्त, प्रमेहरोगी, कामी, व्यापारी, वाचाल, स्वाभिमानी, बंधनयुक्त ईष्यालु होता है। नवम भाव में हो तो सन्तति, सम्पत्ति से युक्त, सुखी, धर्मात्मा, कार्यशील, प्रवास प्रिय, भ्रात संख्या कम होती है। दसवें भाव में हो तो कार्यकुशल, दयालु, कमजोर, बुद्धिहीन, कार्य-परायण, दुखी, कुलदीपक, संतोषी, लोकहितैषी, प्रसन्नचित्त, दीर्घायु होता है। ग्यारहवें भाव में हो तो चंचल, गुणी, संतान व संपत्तियुक्त, लोकप्रिय, शासकीय कार्यों में निपुण होता है। बारहवें भाव में हो तो चंचल, नेत्र रोगी, कफ रोगी, क्रोधी, एकांत प्रिय, मृदुभाषी, अपव्ययी व चिंताशील होता है।

चंद्र शांति हेतु उपाय

यदि चंद्रमा अशुभ स्थिति में हो तो -

  • खाते समय चांदी के बर्तनों का प्रयोग करना चाहिए अथवा चारपाई के पायों में चांदी के कील ठुकवाना चाहिए।
  • सफेद मोती की माला या चांदी की अंगूठी में मोती धारण करना चाहिए।
  • यदि चंद्रमा अषुभ हो तो कांसे के बर्तनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • पानी में कच्चा दूध डालकर चंद्रमा का मंत्र बोलकर पीपल की जड़ में अर्पित करना चाहिए।

मोती परीक्षण विधि

शुद्ध व श्रेष्ठ मोती हल्का चिकना निर्मल कांतियुक्त होता है गौमूत्र या किसी मिट्टी के बर्तन में मोती रातभर डालकर रखें तो शुद्ध मोती खण्डित नहीं होगा अथवा पानी से भरे काँच के गिलास में मोती डाल दिया जाए तो पानी में से किरणें निकलती दिखाई देंगी यही श्रेष्ठ मोती की पहचान है। मोती के अभाव में चंद्रकांत मणि या श्वेत पुखराज भी धारण किया जा सकता है।

मोती धारण विधि

मोती या चंद्रकांतमणि को चांदी की अंगूठी में मढ़वाकर शुक्लपक्ष के सोमवार को पूर्णिमा को या चंद्र की होरा में गंगाजल से धोकर बीजमंत्र का जप करते हुए अनामिका या कनिष्ठा अंगुली में धारण करना चाहिए। धारण करने के बाद चीनी, चावल, वस्त्र, दही, दूध का दान करना चाहिए।

मोती धारण करने के लाभ

मोती धारण करने से मानसिक शांति व स्मरण शक्ति, मूर्छा, मिर्गी, उन्माद, रक्तचाप, उदर विकार, पथरी और दंतरोगों में लाभ मिलता है।

विशेष- मेष, वृष, मिथुन, कर्क, तुला, वृष्चिक, मीन राशी या लग्न वालों को मोती धारण करना शुभप्रद होता है। मानसिक शक्ति का विकास, सौन्दर्य की वृद्धि, स्त्री व धन सुख की वृद्धि होती है।

मंगल रत्न - मूंगा

भौम रत्न को यदि हिन्दी में मूंगा, संस्कृत में प्रवाल, अंगार मणि , अंग्रेजी में कोरल कहा जाता है ! मूंगा मुख्य रूप से लाल, सिन्दूरी, गेरूआ वर्ण का होता है।

यदि जन्म कुण्डली या वर्ष में मंगल अषुभ चल रहा हो तो भौम के बीज मंत्र का 10 हजार की संख्या में जप शुक्ल पक्ष के मंगलवार से प्रारंभ करना चाहिए।

मंगल का बीज मंत्र - ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः

भौम के निमित्त दान योग्य वस्तुएं

गेंहूँ, मसूर, लाल बैल, गुड़, घी, मूंगा, लाल चंदन, व लाल वस्त्र, केशर, नारियल, गुड़, से बने पूए या रोटी रेवडियाँ इत्यादि । भौम का दान युवा ब्राहृमण को ही देना चाहिए।

द्वादश भावों में भौम फल

यदि मंगल लग्न या प्रथम भाव में हो तो जातक क्रूर, साहसी, चपल, महत्वाकांक्षी, लौहधातु व चोट आदि से कष्ट पाने वाला व्यवसाय में हानि उठाने वाला होता है। द्वितीय भाव में हो तो कटुभाषी, धनहीन, निर्बुद्धि, पशुपालक, कुटुम्ब क्लेषी, धर्मप्रेमी, नेत्र कान रोगी होता है। तृतीय भाव में हो तो प्रसिद्ध शूरवीर, धैर्यवान, साहसी, बंधुहीन, प्रदीप्त, जठराग्नि युक्त झाइयों के लिए कष्टकारक व कटुभाषी होता है। चतुर्थ भाव में हो तो वाहन सुखी, संततिवान, मातृ सुखविहीन, प्रवासी, अग्नि भय युक्त, अल्पमृत्यु, कृषक, बंधु विरोधी होता है। पंचम भाव में हो तो अग्रबुद्धि, कपटी, व्यसनी, रोगी उदर रोगी, गुप्तांग रोगी, चंचल, बुद्धिमान, क्लेष प्रिय होता है। छटवें भाव में हो तो प्रबल अफसर, दाद रोगी, क्रोधी होता है। सातवें भाव मे हो तो शीघ्र क्रोधी, स्त्री सुख हीन, राजभीरू, कटुभाषी, धूर्त, मूर्ख, निर्धन, घातकी, धननाशक होता है। आठवें भाव में भाव हो तो व्याधिग्रस्त, व्यसनी, मद्य प्रिय, कठोर भाषी, नेत्र रोग, शस्त्र चोर, संकोच, रक्त विकार धन की चिंता से युक्त होता है। नवें भाव में हो तो द्वेषी, अभिमानी, कोधी, नेता, अधिकारी, ईष्यालु, अल्पलाभी, यशस्वी, असंतुष्टि, भ्रातृविरोधी होता है। दसवें भाव में हो तो धनवान कुलदीपक, उत्तम वाहनों से युक्त, स्वाभिमानी संतान से कष्ट पाने वाला होता है। ग्यारहवें भाव में हो तो दंभी, कटुभाषी, झगड़ालू, क्रोधी, अल्पभाषी, प्रवासी, न्यायवान, धैर्यवान होता है। बारहवें भाव में हो तो नेत्र रोगी स्त्री से कष्ट पाने वाला झगड़ालू, मूर्ख व व्ययाशील प्रवृत्ति का होता है।

भौम शांति हेतु उपाय

जब कुण्डली में मंगल अशुभ हो -

  • तांबे की अंगूठी में मूंगा धारण करना या तांबे का कड़ा पहनना चाहिए।
  • मंगलवार को घर में गुलाब का पौधा लगाना चाहिए व 108 बार रात से प्रातः काल तक तांबे के बर्तन में पानी सिरहाने रखकर घर में लगाये हुए गुलाब के पौधे में देना चाहिए।
  • मंगलवार का व्रत रखकर 27 मंगल किसी अपाहिज को गुड़ से बने भोजन खिलावें।
  • नारियल का तिलक करके लाल कपड़े में बाँध जल में बहाना चाहिए।
  • लाल वर्ण की गाय या कुत्ते को भोजन कराना चाहिए।
  • श्री हनुमान जी की पूजा करना चाहिए।

मूंगा परीक्षण विधि

असली मूंगा को यदि खून में डाल दिया जाए तो उसके चारों ओर गाढ़ा रक्त जमा होने लगता है असली मूंगा को यदि गाय के दूध में डाल दिया जाए तो उसके लाल झाईं दिखाई देने लगती है।

मूंगा धारण विधि

शुक्ल पक्ष के मंगलवार को मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा नक्षत्र मेष, मकर, वृश्चिक लग्न में 6, 8, 10 या 12 रत्ती के वजन का मूंगा सोने या तांबे की अंगुठी में जड़वाकर अनामिका अंगुली में धारण करना चाहिए। धारण करने के पश्चात् भौम के निमित्त दान करना चाहिए।

मूंगा धारण करने के लाभ

श्रेष्ठ मूंगा धारण करने से भूमि, भ्रात व निरोगता का लाभ प्राप्त होता है इसके अतिरिक्त रक्त विकार भूत-विकार भूत-प्रेत, बाधा, दुर्बलता, मंदाग्नि, वायु, कफ, हृदय रोग व पेट विकार में मूंगे की भस्म का प्रयोग किया जाता है।

विशेष- कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक, मकर, कुंभ, मीन, राशि व लग्न वालों को मूंगा धारण करना लाभप्रद होता है। शरीर कष्ट व कुण्डली में यदि मंगल नीचस्थ हो तो श्वेत मूंगा भी धारण किया जा सकता है।

बुध रत्न - पन्ना

बुध का मुख्य रत्न पन्ना है संस्कृत में उसे मरकत मणि, अश्मगर्भ, फारसी में जमरूद, अंग्रेजी में इसराल्ड कहते हैं।

जब जन्मकुण्डली में या वर्ष में बुध अशुभ हो तो भगवान विष्णु का ध्यान करके शुक्लपक्ष में बुध के बीज मंत्र का 1000 बार जप करना चाहिए।

बुध का बीज मंत्र - ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः

बुध के निमित्त दान वस्तुएं

मूंगी, 5 हरे फल, हरे फूल, छोटी इलायची, कांस्यपात्र, पन्ना, सोना, हाथी दाँत, हरी सब्जी, कपड़ा व गाय के लिए हरा चारा इत्यादि।

द्वादश भावों में बुध फल

लग्न व प्रथम भाव में बुध हों तो जातक दीर्घायु, गणितज्ञ, विनोदी, परोपकारी, वैद्य, स्त्री प्रिय, मितव्ययी होता है। द्वितीय भाव में हो तो वक्ता, सुंदर, सुखी, गुणी, मिष्ठान प्रिय, दलाल, वकील, साहसी होता है। तृतीय भाव में हो तो कार्यदक्ष, परिश्रमी, भीरू, लेखक, सामुद्रिक, शास्त्री, व्यवसायी, यात्रा प्रिय, स्थूल शरीर, आलसी होता है। चतुर्थ भाव में हो तो गतिप्रिय, बंधुप्रेमी, लेखक, नीतिज्ञ चतुर होता है। पंचम भाव में हो तो प्रसन्न चित्त, तेजबुद्धि, सदाचारी, संगीत प्रिय, सदाचारी, पण्डित होता है। छठवें भाव में हो तो विवेकवादी, कलह प्रिय, आलसी, रोगी, परिश्रमी, दुर्बल, कामी, अभिमानी होता है। सातवें भाव में हो तो सुंदन, कुलीन, विद्वान, धनी, लेखक, कार्यकुशल, धार्मिक, दीर्घायु संपादक होता है। आठवें भाव में हो तो लब्ध, प्रतिष्ठित, अभिमानी, कृषक, राजमान्य, मानसिक दुःखी, कवि, गवैया, धनवान होता है। नवम् भाव में हो तो सदाचारी, गायक, ज्योतिषी, लेखक, भाग्यवान, न्यायप्रिय होता है। दसवें भाव में हो तो माता पिता का भक्त, जमींदार, भाग्यवान, योगी, सदाचारी, न्यायी होता है। ग्यारहवें भाव में हो तो दीर्घायु पुत्रवान, विचारशील, शत्रुनाशक होता है। बारहवें भाव में हो तो विद्वान आलसी, अल्पभाषी, शास्त्रज्ञ, लेखक, वेदान्ती व सुन्दर वकील व धर्मात्मा होता है।

बुध शांति हेतु उपाय

कुण्डली में जब बुध शुभ फल नहीं दे रहा हो -

  • हरे रंग का पन्ना सोने की अॅंगूठी में जड़वाकर पहनना चाहिए।
  • हरे रंग के वस्त्र, पर्दा, गाड़ी, स्कूटर भी हरे वर्ण की उपयोग करनी चाहिए।
  • बुध के दिन कांसेके गोल टुकड़े हरे वस्त्र में लपेटकर जेब में रखें।
  • हरे रंग की साड़ी व चूड़ी बुध के दिन किसी हिजड़े को दान करें।

पन्ना परीक्षण विधि

पन्ना स्वच्छ, पारदर्शी, कोमल चिकना व चमकदार होता है शीशे के गिलास में साफ पानी में डालने से हरी किरणें दिखाई देती हैं असली पन्ना हाथ में लेने पर आँखों को शीतलता देता है।

पन्ना धारण विधि

पन्ना 3, 6, या 7 रत्ती का लेकर शुक्ल पक्ष के बुधवार को आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती, पूफा, व पुष्य नक्षत्र में स्वर्ण की अंगूठी में मढ़वाकर धारण करना चाहिए। बुध मंत्र की 5 माला व दान करना चाहिए।

पन्ना धारण करने के लाभ

पन्ना धारण करने से स्मरण शक्ति व बुद्धि की वृद्धि होती है। यह रत्न जादू, टोना, रक्तविकार, नेत्ररोग, दमा, गुर्दे का विकार, मानसिक विकलता व बहुमूत्र रोग में उपयोगी होता है।

विशेष- पन्ना विशेष कर वृष, मिथुन, मकर व मीन राशि धारकों को धारण करना शुभप्रद होता है। व यह रत्न विद्या बुद्धि व व्यापार में भी लाभप्रद होता है। पन्ना सुखकारक व आरोग्यता कारक भी है।

गुरू रत्न - पुखराज

पुखराज रत्न के प्रतिनिधित्व कर्ता गुरूदेव हैं। संस्कृत में इसे पितस्फटिक, हिन्दी में पुखराज अंग्रेजी में इसे टोपाज कहते हैं।

जब किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली या वर्ण कुण्डली गुरू शुभप्रद नहीं हो तो शुक्लपक्ष के गुरूवार को शुभ मुहूर्त में गुरू के बीज मंत्र 19000 बार जाप करना चाहिए।

गुरू का बीज मंत्र - ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवै नमः

गुरू के निमित्त दान वस्तुएं

पीला चावल, पुखराज, चने की दाल हल्दी, पीले फूल, बेसन के लड्डू, केला, पीला वस्त्र व घोड़ा, लवण, शक्कर, मिठाई दक्षिणा।

द्वादश भावों में गुरू का फल

यदि कुण्डली में गुरू प्रथम भाव में हो तो जातक ज्योतिषी, दीर्घायु, ज्योतिषी, कर्तव्य परायण, स्पष्ट वक्ता, तेजस्वी, धर्मात्मा, राज्यमान होता है। द्वितीय भाव में हो तो सुंदर, मधुरभाषी, संततिमान, भाग्यवान, दीर्घायु, व्यवसायी होता है। तृतीय भाव में हो तो जितेन्द्रिय, मंदाग्नि, शास्त्रज्ञ, लेखक, पर्यटनशील, स्त्रीप्रिय व वाहन सुख से पूर्ण होता है।चतुर्थ भाव में हो तो भोगी, सुंदर, उद्योगी, कार्यविद्र ज्योतिष, संतान रोधक, यशस्वी माता-पिता का भक्त व्यवहार कुशल होता है। पंचम भाव में हो तो आस्तिक, लोकप्रिय, कुलश्रेष्ठ, सट्टेबाज, नीतिकुशल, संतानयुक्त होता है। छठवें भाव में हो तो मधुरभाषी, ज्योतिषी, विवेकी, प्रसिद्ध विद्वान, सुकर्मूरक, दूर्बल, उदार निरोगी, प्रतापी होता है। सातवें भाव में हो तो भाग्यवान, विद्वान प्रधान, नम्र, सुंदर स्त्री प्रेमी, परस्त्रीरत होता है। आठवें भाव में हो तो दीर्घायु शील संपन्न, सुखी, शांतिप्रिय, मधुरभाषी, विवेकी गंथकार ज्योतिष व धर्म प्रेमी गुप्तरोगी मित्रों द्वारा धन नाशक करने वाला होता है। नवमें भाव में हो तो तपस्वी, यशस्वी, वेदांती, भक्त, राज्य पूज्य, पुत्रवान, धर्मात्मा होता है। दशम भाव में हो तो सुन्दर, निरोगी, धनिक, संतोषी, सदव्ययी, व पराक्रमी होता है। बारहवें भाव में हो तो आलसी, मितभाषी, सदाचारी, लोभी, दुष्ट, चित्तवाला शस्त्रज्ञ व संपादक होता है

गुरू शांति हेतु उपाय

यदि गुरू अनिष्ट कारक व अशुभ फल दे रहा हो तो-

  • तर्जनी अंगुली में स्वर्ण या चांदी की अंगुठी में पुखाज धारण करें।
  • केसर का तिलक व केसर की पुडि़या जेब में रखें।
  • पुष्य नक्षत्र में केले की जड़ सीधे हाथ में धारण करें।

पुखराज परीक्षण विधि

पुखराज चिकना, हाथ में लेने पर भारीपन पारदर्शी, कसौटी पर घिसने से चमक में वृद्धि, चौबीसघंटे दूध में रखने पर अंदर नहीं हो, तो पुखराज असली व शुद्ध माना जाता है।

पुखराज धारण विधि

पुखराज 3,5,7,9 या 12 रत्ती का सोने की अंगूठी में जड़वाकर गुरू पुष्य योग या शुक्ल पक्ष में गुरूवार या पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद, नक्षत्र में धारण करें। पुखराज की जगह इसका उपरत्न सुनैला भी पुखराज की तरह धारण किया जा सकता है। भगवान गुरू के पूजा, गऊ के लिए चारा डालें व गुरू के निमित्त दान करें।

पुखराज धारण करने के लाभ

पुखराज धारण करने से प्रेत बाधा व स्त्री सुख में आई बाधा दूर होती है। चिकित्सा शास्त्र में शहद या केवड़ा के साथ पुखराज की भस्म देने से तिल्ली, पाण्डुरोग, खाँसी, दंतरोग, पीलिया, बवासीर, मंदाग्नि, पित्त ज्वर आदि में लाभदायक होता है।

विशेष- पुखराज धारण करना मेष, धनु, मीन, कर्क, वृश्चिक राशि वालों को लाभप्रद रहता है। यदि किसी विषैले कीड़े ने काट लिया हो तो पुखराज घिस के लगाने से विष उतर जाता है।

शुक्र रत्न - हीरा

शुक्र - शुक्रचार्य जी का मुख्य रत्न हीरा है संस्कृत में इसे वज्रमणि हीरा अंग्रेजी में डायमण्ड कहते हैं ।

यदि किसी जातक की कुण्डली या वर्ष कुण्डली में शुक्र शुभप्रद नहीं हो तो शुभ मुहूर्त में शुक्र के बीज मंत्र का 16000 की संख्या में जाप करना व दशमांश हवन करने से शुक्र कल्याणप्रद फल प्रदायक होता है।

शुक्र का बीज मंत्र - ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः

शुक्र के निमित्त दान वस्तुएं

चांदी, चावल, दूध, दही, घी, सोना, मिश्री, श्वेत चंदन, व वस्त्र, श्वेत फूल, मिष्ठान व दक्षिणा इत्यादि।

द्वादश भाव में शुक्र का फल

यदि शुक्र लग्न में प्रथम भाव में हो तो जातक, दीर्घायु, ऐश्वर्यवान, मधुरभाषी, प्रवासी, भोगी, विलासी व कामप्रिय होता है। द्वितीय भाव में हो तो मिष्ठान प्रिय, यशस्वी, जौहरी, लोकप्रिय, समयज्ञ लम्बा, कुटुम्ब, साहसी, भाग्यवान होता है। तृतीय भाव में हो तो आलसी, पराक्रमी, चित्रकार, पर्यटनशील, भाग्यवान, कंजूस होता है। चतुर्थ भाव में हो तो सुंदर, बलवान, व्यवहार दक्ष, विलासी, पुत्रवान, दीर्घायु होता है। पंचम भाव में हो तो सुखी, सद्गुणी, न्यायवान, आस्तिक, उदार, विद्वान, शत्रुनाशक, वक्ता कवि, लाभयुक्त होता है। छठवें भाव में हो तो स्त्री-सुख विहीन, बहुमित्रवान, मूत्र रोगी, मितव्ययी, वैभवहीन होता है। सातवें भाव में हो तो स्त्री-सुखी, साधु, प्रेमी, अल्पव्यभिचारी, संगीत प्रिय, चिंतित होता है। तथा विवाह के भाव भाग्य उदय होता है। आठवें भाव में हो तो विदेश प्रवासी, ज्योतिष निर्दयी, गुप्तरोगी, पर्यटनशील, परस्त्रीरत होता है। नौवें भाव में हो तो आस्तिक, गुणी, गृहसुखी, प्रेमी, तीर्थो में प्रवास, ज्योतिषी, लोभी होता है। ग्यारहवें भाव में हो तो विलासी, स्थिर, लक्ष्मी, परोपकारी, जौहरी, कामी, पुत्रवान होता है। बारहवें भाव में हो तो न्यायशील, आलसी, परस्त्रीरत, धनवान, मितव्ययी, शरीर स्थूल व जातक शत्रु नाशक होता है।

शुक्र शांति हेतु उपाय

  • चांदी के दीपक में कपूर चंदन की अगरबत्ती कमरें में जलाये।
  • घर में तुलसी पूजा करें, सफेद वस्त्र इस्तेमाल करें पर्दे भी सफेद रंग के लगवायें।
  • पांच शुक्रवार गाय को हरा चारा डालें।
  • दुर्गा पूजा कर 5 कन्याओं को भोजन करायें।
  • शुक्र यंत्र चांदी के पात्र में लिखवाकर श्वेत वस्त्र में बांध कर नीम के नीचे दबायें।

हीरा परीक्षण विधि

  • हीरा यदि पिघले घी में डाल दिया जाए तो घी जमने लगता है
  • तोतले बच्चे के मुँह में रखने से बच्चा बोलने लगता है।
  • धूप में हीरे में से इंद्रधनुष जैसी किरणें निकलती है
  • अँधेरे में हीरा चमकता है।

हीरा धारण विधि

शुक्राचार्य जी रत्न हीरा शुक्लपक्ष में शुक्रवार को भरणी, पुष्य, पूषाढ़ नक्षत्र में सोने की अंगूठी में धारण करना चाहिए। धारण करने के पश्चात् मंत्र जपें गाय को चारा डालें, शुक्र के निमित्त दान करें।

हीरा धारण करने के लाभ

हीरे का चिकित्सा शास्त्र में भी बड़ा महत्व है इसकी भस्म शहद या मलाई के साथ चाटने से, दौर्बल्यता, नपुसंकता, वीर्य विकार, श्वेतप्रदर, हृदयरोग, सूखा रोग, मानसिक रोग में लाभदायक होता है। हीरा धारण करने से लक्ष्मी वृद्धि व वैवाहिक सुख में आया व्यवधान दूर होता है।

विशेष- हीरा वृष, मिथुन, कन्या, तुला, मकर राशि धारकों को धारण करना शुभप्रद रहता है। हीेरे की जगह शुक्र का उपरत्न फिरोजा व ओपल भी धारण किया जा सकता है। सभी रत्न तर्जनी अंगुली में धारण करें।

शनि रत्न - नीलम

शनि ग्रह का रत्न नीलम है इसे नील, नीलमणि व हिनदी में नीलम अंग्रेजी में सैफायर कहते हैं।

जब किसी जातक की जन्मकुण्डली या वर्ष में शनि अशुभ फल दे रहा हो तो शनि के बीज मंत्र का 23 हजार बार जप करें व दशमांश हवन भी करें।

शनि का बीजमंत्र - ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।

शनि के निमित्त दान वस्तुएं

नीलम, लोहे का तवा, उड़द, सरसों का तेल, काले तिल, काला वस्त्र, चमड़े का जूता, काली गाय, भैंस, कस्तूरी, नीले पुष्प इत्यादि।

द्वादश भाव में शनि फल

शनि यदि प्रथम भाव में हो तो धनहीन यदि मकर या तुला का हो तो धनी, सुखी व ऐश्वर्य संपन्न होता है। द्वितीया भाव में हो तो कुटुम्ब व भातृवियोगी, लाभवान होता है। तृतीया भाव में हो तो निरोगी, योगी, विद्वान, शीघ्र कार्यकर्ता, पहलवान चंचल होता है। चतुर्थ भाव में हो तो अपयशी, धूर्त, कपटी, भाग्यवान, क्रोधी, कामी होता है। पांचवे भाव में हो तो वातरोगी, भ्रमणशील, विद्वान, उदासीन, संतान युक्त, आलसी, चंचल होता है। छठवें भाव में हो तो शत्रु हन्ता, कंठ रोगी, सांस रोगी, योगी, कवि, आचार हीन होता है। सातवें भाव में हो तो क्रोधी, धन सुखहीन, स्त्री भक्त, विलासी, कामी होता है। आठवें भाव में हो तो धूर्त, गुप्तरोगी, डरपोक, विद्वान, स्थूल शरीर, परोपकारी होता है। नवम् भाव में हो तो वात रोगी, भ्रमणशील, वाचाल, डरपोक, धर्मात्मा, भ्रातृहीन, शत्रु नाशक होता है। दसवें भाव में हो तो नेता, न्यायी, विद्वान, पुत्रहीन, न्याप्रज्ञ, रोगहीन, बलवान होता है। बारहवें भाव में हो तो उन्माद रोगी अपव्ययी व्यसनी दुष्ट मातुल कष्टदायक व आलसी होता है।

शनि शांति हेतु उपाय

यदि शनि अशुभ फल प्रदायक हो तो निम्न उपाय करने चाहिए -

  • शनि का व्रत व शनि स्तोत्र का पाठ करें।
  • नीलम सोने की अंगूठी में धारण करें काले घोड़े की नाल का छल्ला या नाव की कील का छल्ला धारण करें।
  • वस्त्र, पर्दे, नीले रंग के होने चाहिए।
  • भोजन की थाली में से रोटी निकालकर काले कुत्ते को खिलावें।
  • शनिवार को पीपल नहलायें व सूर्यास्त पश्चात मीठे तेल का चौमुखा दीपक जलावें। दक्षिणमुखी हनुमान जी की आराधना करें।

नीलम परीक्षण विधि

नीलम यदि गाय के दूध में डाल दिया जाए तो दूध का रंग नीला लगने लगता है पानी से भरे गिलास में यदि नीलम डाल दिया जाए तो नीली किरणें दिखाई देने लगती हैं।

नीलम धारण विधि

नीलम 3,5,7,9 या 12 रत्ती का लोहे अथवा सोने में जड़वाकर शुक्ल पक्ष के शनिवार को पुष्प्, उभा, चित्रा, व धनिष्ठा शतभिषा नक्षत्रों में धारण करना चाहिए। धारण के बाद शनि मंत्र जपै शनि के निमित्त दान करें।

नीलम धारण करने के लाभ

नीलम धारण करने से धन-धान्य, यश, कीर्ति, सर्विस, व्यवसाय व वंश में वृद्धि होती है। औषधि के रूप में नीलम से दमा, क्षय, कुष्ठ रोग, अजीर्ण ज्वर, खाँसी, नेत्र रोग, मस्तिष्क विकार मेंलाभ होता हैं।

विशेष - नीलम हमेशा चौबीस घंटे के बाद प्रभाव दिखाता है। नीलम की अनुकूलता जानने के लिए रात्रि को सोते समय रूई में नीलम रखकर सिरहाने रखकर सोयें। गलत स्वप्न आए या कोई विकार हो तो धारण नहीं करना चाहिए।

राहु रत्न - गोमेद

यदि जन्म कुण्डली या वर्ष में राहु अषुभ हो तो शांति के लिए राहु के बीजमंत्र का 18000 की संख्या में जप करें।

राहु का बीज मंत्र- ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः


राहु के निमित्त दान वस्तुएं

सप्तधान्य, तेल, स्वर्ण व रजत, नाग, उड़द, तलवार, काला वस्त्र व तिल, गोमेद, नारियल, पुष्प, मिठाई, दक्षिणा इत्यादि।

द्वादश भावों में राहुफल

लग्न में राहु हो तो जातक दुष्ट, मस्तक रोगी, स्वार्थी राजद्वेशी, कामी होता है। द्वितीय भाव में हो तो परदेशप्रवासी कम से कम क्रोधी, कामी, संग्रहशील होता है। तृतीय भाव में हो तो भ्रमणशील दृढ़ विवेकी, व्यवसायी होता है। चतुर्थ भाव में हो तो असंतोषी, दुखी, मातृ क्लेष युक्त, क्रूर कपटी, मुख व उदर रोगी होता है। पंचम भाव में हो तो मतिमंद, धनहीन, कुलनाशक, कायकर्ता, झूठ बोलने वाला, शस्त्र प्रिय होता है। छठवें भाव में हो तो पराक्रमी, अरिष्ठनाशक, कमरदर्द से पीडि़त होता है। सातवें भाव में हो तो स्त्री नाशक भ्रमणशील व दुराचारी, दुष्कर्मी होता है। आठवें भाव में हो तो पुष्ट शरीर गुप्तरोगी क्रोधी व्यर्थभाषी मुख व उदर रोगी होता है। नवम भाव में हो तो आलसी, वाचाल, अपव्ययी, ग्यारहवें भाव में हो तो मंद मति, लाभ हीन, परिश्रमी, संतान कम होता है। बारहवें भाव में हो तो विवेकहीन, मतिमंद मूर्ख, परिश्रमी, सेवक व हमेषा चिंताशील रहता है।

राहु शांति हेतु उपाय

यदि राहु अशुभ फल प्रदान कर रहा हो तो निम्न उपाय करें -

  • काले व नीले वस्त्र धारण नहीं करने चाहिए।
  • प्रतिदिन चपाती पर दही चीनी रखकर कौए व काले कुत्ते को खिलायें।
  • सात कच्चे कोयले राहु का बीजमंत्र बोलते हुए बहते जल में बहायें।

गोमेद परीक्षण विधि

गोमेद रत्न शनिवार को अथवा स्वाति, शतभिषा व रवि पुष्य योग आद्र्रा नक्षत्र में पंचधातु अथवा लोहे की अॅंगूठी में धारण करना चाहिए। गोमेद मध्यमा अॅंगुली में धारण करना चाहिए। धारण करने के बाद बीजमंत्र का जाप व सप्तधान्य कम्बल का दान करना चाहिए।

गोमेद धारण करने के लाभ

गोमेद धारण करने से मुकदमा वाद-विवाद व धन सम्पत्ति की वृद्धि होती है मुकदमा अपने पक्ष में आता है।

विशेष- जिन जातकों को कुण्डली में राहु 1,4,5,7,9,10,वें भाव में हो उन्हें गोमेद धारण करने से लाभ की प्राप्ति होती है।

केतु रत्न - लहसुनियाँ

केतु रत्न लहसुनियाँ को वैदूर्य व लहसुनिया भी कहते है । अंधेरे में बिल्ली की आँखों के समान चमकता है इस पर तीन सफेद धारियां रहती हैं अतः इस सूत्र मणि भी कहते है। अंगेरजी में इसे कैट'स आई कहते है ।

जिन जातकों की कुण्डली में केतु अशुभ फल प्रदायक हो तो ऐसे जाताकों को केतु के बीजमंत्र का 17000 की संख्या में जाप करना चाहिए व दषमांष हवन भी करना चाहिए।

केतु का बीजमंत्र - ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः

केतु के निमित्त दान वस्तुएं

लहसुनिया, लोहा, नारियल, सप्तधान्य, वस्त्र, तिल, तेल, चाकू, मिठाई, दक्षिणा इत्यादि।

द्वादश भावों में केतु फल

यदि केतु लग्न अथवा प्रथम भाव में हो तो चंचल, मूर्ख, दुराचारी, वृष्चिक राषि का केतु सुखकारक है। द्वितीय भाव मंव हो तो मुख रोगी, गुप्त रोगी, डरपोक होता है। तृतीय भाव में हो तो चंचल, वात रोगी, अघोरी, चण्डाल होता है। चतुर्थ भाव में हो तो चंचल, निरूत्साही, निरूपयोगी होता है। पंचम भाव में हो तो वात रोगी, दुबुर्द्धि होता है। छठवें भाव में हो तो झगड़ालु, प्रेतबाधा से परेषानी, वातरोगी होता है। सप्तम भाव में हो तो मतिमंद, मुर्ख, कायर, डरपोक होता है। आठवें भाव में हो तो तेज हीन, दुष्ट संगति युक्त, सुखहीन होता है। नवम भाव में हो तो कठोर परिश्रमी मजदूर, अपयशी होता है। दसवें भाव में हो तो पितृद्वेषी, मूर्ख, अभिमानी होता है। ग्यारहवें भाव में हो तो बुद्धिहीन, रोगी होता है। बारहवें भाव में हो तो जातक ठग, डकैत व तांत्रिक होता है।

केतु शांति हेतु उपाय-

  • काले तिल व कच्चे कोयला पानी में बहायें।
  • कुत्ते को नित्य दूध पिलायें या गाय को चारा डालें।
  • चीटिंयां चुगायें मछलियों को राम नाम की आटेकी गोलियाँ डालें।

लहसुनिया परीक्षण विधि

लहसुनियाँ को यदि हड्डी के ऊपर रख दिया जाए तो 24 घण्टों में यह रतन हड्डी में छेद कर देता है इसके ऊपर जो श्वेत सूत्र है जो बीच में इधर-उधर होते रहते हैं।

लहसुनिया धारण विधि

लहसुनियाँ को बुधवार के दिन पंचधातु में मढ़वाकर रवि पुष्य योग, अश्वनी मघा मूल नक्षत्र में कनिष्ठका अंगुली में धारण करें करने के बाद मंत्र जपें व केतु के निमित्त दान दें।

लहसुनिया धारण करने से लाभ-

लहसुनियाँ धरण करने प्रेत बाधा व भूत बाधा से शांति मिलती है यह शत्रु रोग का नाष करता है।